Saturday, July 18, 2015

संयुक्त परिवारों से क्यों विमुख हो रहे हैं लोग !!

(कुछ इस प्रथा को अभी भी दांतों से पकडे हैं, और कई ऐसे हैं जिनके लिए यह जंजाल साबित हुआ है, और वो इसमें फंसे फड़फड़ा रहे हैं)

हर प्रकार के सामाजिक समूहों में परिवार सबसे अहम और व्यापक समूह होता है, और परिवार के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती, परिवार के भी कई रूप होते हैं, जैसे मोटे तौर पर देखा जाए तो पश्चिम में एकल परिवार (Nuclear Family) और हमारे देश में संयुक्त परिवार (Joint Family), हम सब में से भी अधिकांश इसी संयुक्त परिवार में पले बढे हैं, संयुक्त परिवार प्रथा कभी एक मज़बूत व्यवस्था मानी जाती थी, दो तीन पीढ़ियां एक साथ रहने के कारण सामाजिक मूल्यों का बराबर से प्रसार होता था, बुज़ुर्गों से नयी पीढ़ी संस्कार सीखती थी, आदर और सम्मान बना रहता था, सुरक्षा की भावना बनी रहती थी, सामाजिक कार्यकलापों में अग्रसर रहते थे, सभी सदस्यों में प्रेम भाव और समर्पण का जज़्बा बना रहता था, संयुक्त परिवार में बच्चों के लिए सर्वाधिक सुरक्षित और उचित शारीरिक एवं चारित्रिक विकास का अवसर प्राप्त होता है .बच्चे की इच्छाओं और आवश्यकताओं का अधिक ध्यान रखा जा सकता है .उसे अन्य बच्चों के साथ खेलने का मौका मिलता है .माता पिता के साथ साथ अन्य परिजनों विशेष तौर पर दादा ,दादी का प्यार भी मिलता है यही कारण है कि संयुक्त परिवारों में पले बढे बच्चे अधिक संस्कारी और और आज्ञाकारी होते है !

मगर अचानक से लोगों का संयुक्त परिवार से मोह भंग होने लगा है, और इस को देखते हुए समाजशास्त्री चिंतित भी हैं, इसके मूल में कई कारण हैं जैसे कि रोज़गार धंधे के लिए लोगों का गाँवों और शहरों से पलायन, परिवार के लोगों की बढ़ती महत्वकांक्षाएं, निजता की अधिक चिंता, आर्थिक असमानताएं, परिवार के सदस्यों के बीच त्याग, समर्पण की ख़त्म होती भावना, ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना, निजी स्वार्थों को परिवार से अधिक महत्त्व देना, संयुक्त परिवार के मुखिया के पक्षपात पूर्ण निर्णयों से भी बड़ी समस्या उत्पन्न होती है, Generation Gap को ढंग से नहीं पाटना, सामूहिक हित की अनदेखी करने से भी पारिवारिक सहयोग समाप्त होता है, अमीर सदस्य या उच्च पद वाले सदस्य के प्रति मुखिया का नर्म रवैय्या, किसी भी पारिवारिक समस्या को सुलझाने में मुखिया के संदेहास्पद निर्णय से परिवार में कलह की स्थिति उत्पन्न होती है, सदस्यों में असंतोष पनपता है, जो कि आगे जाकर विस्फोटक भी हो जाता है, जिस घर में कलह और किट किट आम हो जाए तो उस परिवार में पारिवारिक मूल्यों का क्षरण तो होता ही है, नयी पीढ़ी भी इससे प्रभावित होती है !

बुजुर्ग लोग दुनिया में आ रहे सामाजिक बदलाव को अनदेखा कर युवा पीढ़ी के परंपरा विरोधी व्यव्हार से क्षुब्ध रहते हैं। उसके लिए सिर्फ और सिर्फ अपनी संतान को दोषी मानते हैं। वे उनकी तर्क पूर्ण बातों को बुजुर्गों का अपमान मानते हैं। वे युवा पीढ़ी की बदली जीवन शैली से व्यथित होते हैं। नयी जीवन शैली की आलोचना करते हैं। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों का सम्मान तो करना चाहती है या करती है परन्तु चापलूसी के विरुद्ध , परन्तु बुजुर्ग उनके बदल रहे व्यव्हार को अपने निरादर के रूप में देखते हैं। बुजुर्गो के अनुसार उनकी संतान को परंपरागत तरीके से अपने माता पिता की सेवा करनी चाहिए, नित्य उनके पैर दबाने चाहियें उनकी तबियत बिगड़ने पर हमारी मिजाजपुर्सी को प्राथमिकता पर रखना चाहिए। उन्हें सब काम धंधे छोड़ कर उनकी सेवा में लग जाना चाहिए और यही उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। यही संतान का कर्तव्य होता है। उनके अनुसार संतान की व्यक्तिगत जिन्दगी, उसकी अपनी खुशियाँ, उसका अपना रोजगार, उसका अपना परिवार कोई मायेने नहीं रखता। और जब संतान उनकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती तो वे उन्हें अहसान फरामोश ठहराते हैं। 

कभी कभी घर के बुजुर्ग व्यक्ति अपनी संतान के मन में उनके लिए सम्मान को, अपनी मर्जी थोपने के लिए इस्तेमाल करते हैं उन्हें भावनात्मक रूप से ब्लेक मेल करते हैं। इस प्रकार से वे अपनी संतान के भविष्य के साथ तो खिलवाड करते ही हैं, उनके मन में अपने लिए सम्मान भी कम कर देते हैं। और उपेक्षा के शिकार होने लगते हैं। अतः प्रत्येक बुजुर्ग के लिए आवश्यक है की कोई भी निर्णय लेने से पूर्व अपने हित से अधिक संतान के हित के बारे में सोचें ताकि उनके भविष्य को कोई नुकसान न हो या कम से कम हो।

साधारणतयः परिवार में युवा पुरुष या दंपत्ति परिवार की आय का स्रोत होते है, जिसके द्वारा अर्जित धन से वह अपने बीबी बच्चों के साथ घर के बुजुर्गों के भरण पोषण की जिम्मेदारी भी उठाता है। इसलिए उसका नजरिया भी महत्वपूर्ण होता है। वह अपने बुजुर्गों के प्रति क्या विचार रखता है? उन्हें कितना सम्मान देना चाहता है,वह अपने बीबी बच्चों और बुजुर्गों को कितना समय दे पाने में समर्थ है,और क्यों ? वह अपने परिवार के प्रति, समाज के प्रति क्या नजरिया रखता है ? वह नए ज़माने को किस नजरिये से देख रहा है? क्योंकि वर्तमान बुजुर्ग जब युवा थे उस समय और आज की जीवन शैली और सोच में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ चुका है।

अक्सर देखा गया है की बुजुर्गों का अपने बच्चों के प्रति नकारात्मक नजरिया उनकी समस्याओं का कारण बनता है। वे अपनी संतान को अपने अहसानों के लिए कर्जदार मानते हैं। उनकी विचारधारा के अनुसार उन्होंने अपनी संतान को बचपन से लेकर युवावस्था तक लालन पालन करने में अनेक प्रकार के कष्टों से गुजरना पड़ा,जिसके लिए उन्हें अपने खर्चे काट कर उनकी सुविधाओं का ध्यान रखा, उनकी आवश्यकताओं के लिए अपनी क्षमता से अधिक प्रयास किये। ताकि भविष्य में ये बच्चे हमारे बुढ़ापे का सहारा बने। जब आज वे स्वयं कमाई करने लगे हैं तो उन्हें सिर्फ हमारे लिए सोचना चाहिए, हमारी सेवा करनी चाहिए। कभी कभी तो बुजुर्ग लोग संतान को ज़र खरीद गुलाम के रूप में देखते हैं।

यह भी एक हकीकत है कि संयुक्त परिवारों के टूटने के गंभीर परिणाम सबसे ज़्यादा बुज़ुर्गों को ही भुगतने पड़ते हैं ! इसलिए अगर पारिवारिक मूल्यों को सहेज कर रखना है, और संयुक्त परिवार प्रथा को बनाये रखना है तो हाथ दोनों ओर से ही बढ़ाने होंगे, बुज़ुर्गों और परिवार के सदस्यों को नि:स्वार्थ सहयोग, सम्मान और बलिदान के लिए आगे आना होगा, अन्यथा आने वाले दशकों में यह दुर्लभ प्रथा देखने या दिखाने को हमें गांवों और ढाणियों में जाना पड़ेगा !!

Tuesday, January 24, 2012

जनलोकपाल आन्दोलन को तहरीर चौक का पायजामा मत पहनाइये ~~~!!


अन्ना के अनशन को जनक्रांति बताने वाले चपल रिपोर्टरों की यह मजबूरी समझिए कि उन्हें टीआरपी रेस में टिके रहने के लिए घटना का चरम प्रस्तुत करना ही होगा. वे जनक्रांति से आगे का कोई शब्द जानते होते तो अन्ना के अनशन के लिए वह प्रयोग करते. यह तो भला हो कि जनक्रांति के ऊपर का कोई शब्द उनके पल्ले नहीं पड़ा नहीं तो टेलीवीजन मीडिया इसे वह भी बना देता. लेकिन जिस जन की उपस्थिति को क्रांति बताई जा रही थी वह जन शहरी मध्य वर्ग या फिर उस मध्य वर्ग का पिछलग्गू जमातें थी. उनका वहां होना जहां अन्ना हजारे का अनशन चल रहा था यह सिर्फ और सिर्फ टेलीवीजन मीडिया की मौजूदगी की वजह से था. मसलन, अन्ना की जीत के जश्न में जिस इंडिया गेट पर जश्न मनाया जा रहा था वहां न तो उतने लोग थे जितना दावा किया जा रहा था और न ही सेलिब्रेशन जैसा कोई माहौल. हुड़दंग का आलम था और उस हुड़दंग में टेलीवीजन पर दिख जाने की होड़. टेलीवीजन पर दिखते ही फोन किसी परिचित को लग जाता और इधर से पूछा जाता कि "आज तक पर अभी थोड़ी देर पहले मैं आ रहा था. तुमने देखा क्या?" रात सवा नौ बजे तक इसी तरह सेलिब्रेशन चलता रहा. सवा नौ बजे के करीब पुलिस ने कहा टेलीवीजन चैनल्स को कहा लाइट्स आफ. और कमाल देखिए सवा दस बजे वहां से सारा सेलिब्रेशन गायब हो चुका था. कारण साफ़ है....बिना टीवी के अन्ना की जीत का जश्न घण्टे भर भी नहीं टिक सका. आन्दोलन के नाम पर टी वी कैमरों की चमक की चाशनी छलका कर..जनता को एक बार घेरा जा सकता है...दो बार घेरा जा सकता है...मगर बार बार जनता को आवाज़ लगा कर आन्दोलन का मजमा नहीं लगा सकते...यह बात अन्ना के मुंबई अनशन से एक दम साफ़ हो गयी है...और टीम अन्ना के भी होश इस विफलता से उड़े हुए हैं...यहाँ मीडिया के कैमरे...और लाईट के साथ एनजीओवादी मेनेजमेंट की भी सारी तिकड़में धरी की धरी रह गयी थी.... रही सही कसर मुंबई हाई कोर्ट ने पूरी कर डाली थी...!

जो लोग यह समझते हैं कि यह अन्ना का अनशन था और उसे मीडिया  ने रिपोर्ट किया, उन्हें अपने वाक्य को अब शायद दुरुस्त कर लेना चाहिए. यह मीडिया का अनशन था जिसमें नायक की भूमिका अन्ना हजारे ने निभाई. स्टेड लगाने से लेकर जनक्रांति घोषित कर देने तक सारा आयोजन टेलीवीजन मीडिया और कुछ एनजीओवादी कर्मठ कार्यकर्ताओं की देन थी. जैसे एक दशक पहले कुछ आतंकवादियों ने गन की नोक पर भारतीय संसद को गिरवी बनाने की कोशिश की थी, कुछ कुछ वैसी ही कोशिश इस बार न्यूज मीडिया ने अपने गनमाइक से की. अन्ना को आगे करके भारतीय मीडिया ने पंद्रह दिनों तक अपनी टीआरपी को संभाले रखा. फायदे के इस अर्थशास्त्र में रास्ते में जो कोई आया टेलीवीजन ने उसके सिर कलम कर दिये. टेलीवीजन ने राजघाट से कत्लेआम का जो यह सिलसिला शुरू किया था वह इंडिया गेट पर आकर खत्म हुआ...यह  मीडिया और अन्ना कि जुगलबंदी और एनजीओवादी मेनेजमेंट का एक  उदाहरण है...जिसको तहरीर चौक जैसी आलीशान क्रान्ति का पायजामा पहनने की विफल कोशिश भी इस बाजारवादी और टीआरपी मोहित मीडिया ने की थी...!!

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माँ बाप दोराहे पर, बच्चे चौराहे पर~~~~~!!



आज के दौर में जब भी अपने चारों और नज़र डालता हूँ तो अपने अनजाने future की तरफ  बेतहाशा भागते हुए मशीनी  बच्चों और नौजवानों को देख कर अजीब सा महसूस होता है,  competition के इस दौर में बच्चे एक robot की तरह से नज़र आने लगे हैं, जो की एक मकसद के लिए ही program किये गए हैं, बड़ी से बड़ी post हासिल करना और बड़ी से बड़ी डिग्री हासिल करना, और इन सब के बीच एक चीज़ लगातार ग़ायब होती जा रही है और वो है उनके संस्कार, और social values के बारे में जानकारी!  जो तहज़ीब और values हमारे बुजुर्गों में थी और लगभग हमारी पीढ़ी तक आने के बाद अब शायद एक बड़ा  gap सा आ गया है,  और इस gap को बढ़ने में कहीं न कहीं एक माँ बाप के रूप में हम भी इसके कुसूरवार हैं, क्योंकि जो तहज़ीब, संस्कार और social values हमें अपने बुजुर्गों से विरासत में मिली थी हम उनको आगे बढाने में नाकाम होते जा रहे हैं, और इसकी वजह साफ़ तौर पर इस भागम भाग और मार काट वाली प्रतियोगिता ही है !

बचपन में परिवारों में बुज़ुर्ग और माँ बाप अपने बच्चों को motivational stories सुनाते थे, बच्चों को अच्छी अच्छी कहानियां और किस्से सुना कर उसमें संस्कार और समझ भरी जाती थी, परिवार से ही उसको काफी बुनियादी बातें और उंच नीच , झूठ और सच, अल्लाह और इश्वर, सबके बारे में किस्से और कहानियों और बातों के ज़रिये, धार्मिक किताबों के ज़रिये ...अच्छी तरह से समझा दिया जाता था, मगर अब यह सब बातें एक black & White फिल्म की तरह से ख़त्म हो सी गयी हैं, इसके लिए देखा जाए तो बदलते हुए दौर, मारा मारी, busy life , कठिन मुकाबला और भी कई बातें ज़िम्मेदार हैं...आज जहाँ nuclear family का दौर चल निकला है, जहाँ माँ बाप और दो बच्चों को ही एक परिवार कहा जाता है, संयुक्त परिवार गायब होते जा रहे हैं, और इसके साथ ही बुजुर्गों की जगह भी ऐसे परिवारों से गायब होती जा रही है, ऐसे Nuclear families में जहाँ माता पिता दोनों ही नौकरी करते हों, और बच्चे घर के नौकरों के हवाले हों, वहां कौन इन नन्हे मुन्नों को यह सारी शिक्षा, संस्कार, तहज़ीब, और social values के बारे में बताये...? और फिर दूसरी बात आजकल के इस दौर में हर आदमी मशीनी हो गया है, हर काम एक सोचे समझे प्रोग्राम के तहत होता है, यहाँ तक की बच्चा भी ...और फिर उसको पैदा होने के बाद कौनसे स्कूल में  registration कराना है, और फिर स्कूल के बाद कौनसे कालेज में, और फिर कितना donation दे कर क्या बनाना है, यह सब उसके पैदा होने से पहले ही program कर लिया जाता है, या पैदा होते ही तय हो जाता है, यानि बच्चा एक computerized रोबोट हो गया, उसकी पूरी लाइफ का प्रोग्राम बना कर उसको उसी software के हिसाब से टाइम टेबल में फिट कर दिया जाता है, और फिर यह मशीनी बच्चा दिन भर एक मशीन की तरह सुबह उठ कर, टिफन लेकर स्कूल, फिर tuition , फिर yoga क्लास, फिर swimming , फिर जुडो क्लास, फिर घर आकर होम वर्क, और फिर थक कर सो जाना....!

माता पिता बच्चे से चाह कर भी फुर्सत से बैठ कर बात नहीं कर सकते क्योंकि वैसे तो खुद उनके पास ही वक़्त नहीं है, और अगर है...तो फिर बच्चों के पास नहीं है, क्योंकि अगर बच्चों को वक़्त मिलता है तो उसके लिए मनोरंजन के इतने साधन हैं कि वो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं होगा...हमारे समय में बुज़ुर्ग फुर्सत के वक़्त हमें अपनी ज़िन्दगी का निचोड़ और अच्छी अच्छी बातें बताते थे, पढने को अच्छी अच्छी किताबें और कामिक्स हुआ करती थीं, मगर आज के बच्चों के पास मनोरंजन के  लिए कंप्यूटर game हैं, इन्टरनेट है, विडिओ गेम हैं, मोबाइल है, और उसकी दुनिया भी यही है...!

अब ऐसे बच्चों को कैसे किसी अच्छी और बुरी बात के बारे में या संस्कार और social values के बारे में तरीके से बताया जाए, यह लोग अपनी विरासत से दूर होते जा रहे हैं, अच्छा क्या है, बुरा क्या है,  समझने का वक़्त नहीं है, और अगर वक़्त कभी निकल भी आये तो माता पिता के पास वक़्त नहीं होता, जबकि हर माता पिता यही चाहता है कि वो अपने बच्चों को एक अच्छा इंसान बनाये और उसको हर अच्छी बुरी बातों से   परिचित कराया जाए, मगर इस competition भरे  दौर की मारा मारी में सब ख्याल कहीं दब कर रह जाते हैं, माता पिता अपने नौकरी और घर के बीच balance बनाते बनाते एक pendulum कि तरह हो रहे हैं, और बच्चे अपने आप को इस दौर के लायक बनाने के लिए पढ़ाई, इन्टरनेट, coaching , Jim ,  योगा की क्लास  के गोल गोल पहिये में घूम रहा है, एक चमकीले future और अच्छी  नौकरी, और एक बेहतरीन ज़िन्दगी के लिए लगातार हर दिशा में दौड़ लगा रहा है..और इस भाग दौड़, competition , और आपा धापी में इनका नन्हा बचपन कही कुचल कर रह गया है...!

इस दौर की इस त्रासदी को मैं तो यही कह सकता हूँ कि ....माँ बाप दोराहे पर~~~~~और ~~~बच्चे चौराहे पर~~~~~!!

Monday, April 11, 2011

बिकिनी जिंदाबाद~~~~बुर्का मुर्दाबाद~~~~~!!

फ्रांस खुद को सेक्यूलर राष्ट्र कहता है। यदि भारतीय संदर्भ में सेक्यूलर की परिभाषा देखी जाए तो किसी भी इंसान को अपना धर्म मानने और उसके रीति-रिवाजों के मुताबिक रहने की पूरी स्वतंत्रता है। अब पता नहीं ये बात फ्रांस में लागू होती है या नहीं। क्योंकि अब जो प्रस्ताव पास  हुआ है, उससे तो कम से कम यही कहा जा सकता है कि वहां धर्मनिरपेक्ष का मतलब इससे अलग हटकर है। फ्रांस एक विकसित देश है। सामाजिक पिछड़ापन के हिसाब से अब उसकी भारत जैसे देश से तुलना नहीं की जा सकती। फ्रांस आधुनिक युग का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में ये सोचने वाली बात है कि फ्रांस के आधुनिक लोग पुरातन की कैसे वकालत कर सकते हैं। जहां सारे आधुनिक देशों और समाज में इंसानों के शरीर से कपड़े उतर रहे हैं..ऐसे में अगर फ्रांस अपने देश की महिलाओं के शरीर से कपड़े उतरवाना चाहता है तो इसमें गलत क्या है। भले ही भारत जैसे देश में महिला के शरीर से कपड़ा उतरने का मतलब अश्लीलता और उत्तेजना फैलना वाला होता हो, लेकिन फ्रांस में ये समस्या नहीं है। फ्रांस के लोगों पर औरत के नंगे या अधनंगे होने से फर्क नहीं पड़ता। भारत में जरूर पड़ जाता है। फ्रांस कितना आधुनिक है इसका सबसे ताजा उदाहरण तो सरकोजी और उनकी बेगम कार्ला हैं। कइयों के साथ संबंध रखने वाली कार्ला आज सरकोज़ी की बीवी है। कार्ला मॉडल रह चुकी हैं। ऐसे में आप कल्पना कर सकते हैं कि उनके शरीर पर कितने कपड़े हो सकते हैं। अब बीवी का कुछ तो असर सरकोज़ी पर होगा ही। इस असर का निशाना बन गया मुस्लिम धर्म। जी हां फिलहाल फ्रांस में मुसलमानों का बुर्का निशाने पर है। फ्रांस में सार्वजनिक जगहों पर बुर्का पहनने वाली महिलाओं को  700 पाउंड यानी करीब 10,000/- हजार रुपये का जुर्माना देना पड़ेगा। यह जुर्माना उन मुस्लिम पुरुषों के लिए दोगुना हो जाएगा, जो अपनी पत्नियों या फिर घर की किसी महिला को बुर्का पहनने के लिए मजबूर करेंगे। दरअसल, फ्रांस में कानून लागू हो गया है. जिसके तहत सार्वजनिक जगहों पर बुर्का और नकाब पहनने पर जुर्माने का प्रस्ताव है। वैसे सरकोज़ी पहले ही कह चुके हैं कि बुर्का को बिल्कुल भी हटा दिया जाएगा क्योंकि इसकी वजह से फ्रांस जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में गैर-मुस्लिम नागरिक खुद को अलग महसूस करते हैं। चलिए धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सरकोज़ी    इस्लाम और बुर्के पर निशाना साध रहे हैं।

मेरा  मकसद सिर्फ इतना है कि जनता को जो पसंद है उस परंपरा पर रोक लगाना उचित नहीं है।  कम से कम भारत जैसे देश में बुर्का  मुस्लिम महिलाओं का एक ऐसा सुरक्षा कवच तो जरूर है जिससे वे अपने आपको दुनिया की बुरी नज़र से बचा सकती हैं। हमारा मानना है कि महिलाओं को आधुनिक होना चाहिए, लेकिन देह दिखाकर नहीं, पढ़-लिखकर और अपने पैरों पर खड़ा होकर आधुनिक बनना चाहिए।

और बुर्के पर बहस अगर की जाए तो काफी लम्बी हो जायेगी...मगर बुर्के को ज़बरदस्ती पहनाना या ज़बरदस्ती उसको उतरवाना दोनों ही ठीक नहीं हैं, अभी अभी फेसबुक पर कहीं पढ़ा है की शिवसेना ने भी बुर्के पर बैन लगाने की वकालत की है..ठाकरे परिवार हमेशा से मुस्लिम विरोधी, यूपी, बिहार के लोगों को पीट कर और सस्ती लोकप्रियता पाने की कोशिश करता आ रहा है...मगर वोह भूल जाता है की केवल महाराष्ट्र ही पूरा भारत नहीं है.....निकल कर देख ...भारत क्या है....कितना बड़ा है...यूपी और बिहार जा कर देख कभी...अपनी गली में तो कुत्ता भी शेर होता है....देश का ठेका ठाकरे परिवार ने नहीं ले रखा है...यह हिंदुस्तान है....महाराष्ट्र नहीं ठाकरे जी...मन में लड्डू फोड़े जाओ...गली में बैठे भोंकते जाओ..मरने से पहले कुछ अन्ना हजारे से भी सीखते जाओ..जिसकी एक आवाज़ पर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, औरत, मर्द, जवान , बूढे सब जंतर मंतर को दौड़ गए थे...तुझे देखना था, तो वहां देखता, जंतर मंतर पर मोजूद था " पूरा हिंदुस्तान "   !!!

Wednesday, April 6, 2011

क्रिकेट खेला नहीं बेचा जारहा है, और दिमागों में ठूंसा जा रहा है~~~~~~!!

क्रिकेट खेल एक शुद्ध रूप से ऐसा व्यवसाय है जिसमें प्रायोजित रूप से सनसनी, हास्य और गंभीरता प्रस्तुत की जाती है। ऐसा व्यवसाय जो यहां एक नंबर तथा दो नंबर दोनों में सक्रिय लोगों को भारी पैसा और प्रतिष्ठा प्रदान कर रहा है। देश के सारे प्रचार माध्यम यह बात लगातार कह रहे हैं कि आजकल देश में क्रिकेट का मौसम चल रहा है। पता नहीं घोटालों और महंगाई का मौसम कहां चला गया? अब प्रचार माध्यमों को अब देश में केवल क्रिकेट पर नाचते हुए लोग ही दिख रहे हैं महंगाई में पिस रहे ओर घोटालों में अपना दिमाग घिस रहे आम इंसान की परवाह नहीं है।
अभी हाल ही में क्रिकेट एक बीता हुआ समय लग रहा था पर प्रचार माध्यमों ने अपनी कमाई के लिये तमाम तरह के सनसनीखेज प्रसंग और फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों का आकर्षण इसमें जोड़कर इसे जिंदा रखा। मुंबइया फिल्मों की एक नवोदित अभिनेत्री का भारत के दो दो खिलाड़ियों से इश्क का प्रपंच रचवाया तो फिर अपने ही देश किक्रेट खिलाड़ी पर फिक्सिंग का आरोप लगाने वाली एक पाकिस्तानी अभिनेत्री को बिग बॉस कार्यक्रम में बुलवाया। इससे एक बात तो तय हो गयी है कि क्रिकेट और मनोरंजन क्षेत्र में काले चरित्र और सफेद चेहरे वालों का कोई संयुक्त उपक्रम है जो देश विदेश की सीमाओं को नहीं जानते या भूल गये हैं। हमें तो ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों को जानबूझकर उनके ही जाल में फंसाया गया ताकि भारत में होने वाली विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता के सभी मैच साफ सुथरा होने का प्रचार किया जा सके। फिर उसमें शामिल एक पाकिस्तानी खिलाड़ी की पूर्व प्रेमिका से अपने प्रेमी पर लगे आरोप की पुष्टि कराई गयी। यह संभव नहीं है कि पाकिस्तानी क्रिकेट के खिलाड़ी से पंगा ले चुके किसी आदमी को भारतीय मनोरंजन क्षेत्र में प्रवेश मिल सके। इधर भारतीय मनोरंजन क्षेत्र में कार्यक्रम भी पिट रहे हैं तो उस बदनाम पाक अभिनेत्री वीना मलिक को पहले बदनाम क्रिकेटर पर प्रचारात्मक हमला कर उसे एक नायिका के रूप मशहूर किया गया और फिर उसे बिग बॉस कार्यक्रम में उसकी छबि को भुनाया गया।
वह कार्यक्रम ं निपट गया तो वह चली गयी। मगर फिर आया है बिग टॉस का कार्यक्रम! क्रिकेट के टॉस पर बहस के लिये उसे लाया गया। ऐसे ही एक कार्यक्रम में भारत के कथित युवराज के पिता को उसके सामने खड़ा किया। निहायत फालतु कार्यक्रम देखकर यही बात समझ में आयी कि वीना मलिक को भारत में स्थापित करने के लिये कहीं अपने आकाओं को नाराज कर चुके पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों को रंगहाथों फंसाया गया ताकि वह इसमें वीना मलिक िअपने बयान देकर मशहूर हो सके जिसका नकदीकरण भारतीय मनोरंजन क्षेत्र को उसका नकदीकरण करने में सुविधा हो।
इधर प्रचार माध्यम कभी इंग्लैंड की क्रिकेट टीम की बीसीसीआई की-कथित रूप से इंडिया की टीम जिसे भारतीय टीम कहते हुए प्रचार माध्यमों की जुबां चलती ही नहीं-टीम के विरुद्ध रची गयी गुप्त योजना का पर्दाफाश करते हैं तो कभी सचिन को एक एक रन बनाने के लिये बाध्यकर उन्हें थकाने के बंग्लादेश के गुप्त षडयंत्र का उद्घाटन करते हैं। देश को किस तरह मनोरंजन और खेलों के माध्यम से बंधुआ बनाने की कोई योजना है और उस पर अमल हो रहा है। हो सकता है यह सच न हो पर क्या प्रचार माध्यम कभी अपनी विषय सामग्री को प्रसारित करते हुए इस बात का विचार करते हैं कि वह किसके एजेंडे पर काम कर रहे हैं? क्या ऐसी कोई योजना है इसकी जानकारी लेने का प्रयास किसी बुद्धिमान ने नहीं किया। अंग्रेजी के सहारे अपनी नैया पार होने की आशा रखते हुए उसे अपनी घर की स्वामिनी और हिन्दी को केवल खाना परोसने वाली बाई समझते हैं। आप देखिए हिन्दी फिल्म पुरस्कार वितरण समारोहों की भाषा! सम्मानित कलाकर हिन्दी बोलने में कतराते हैं। एक अभिनेत्री तो ऐसी है जो इंग्लैंड में बचपन से रही है। उसे हिन्दी नहीं आती पर फिल्मों में नंबर वन पर है तो विज्ञापन भी उसे बहुत मिलते हैं। इससे एक बात साफ है कि हमारे समाज के धनपति यहां के लोगों केवल धन कमा रहे हैं और अपने व्यवसायिक विस्तार तथा सुरक्षा के लिये वह असामाजिक लोगों के साथ ही विदेशी तत्वों पर निर्भर है। जिनसे कमा रहे हैं और आगे भी कमाना है उस पर भरोसा नहीं है।
हैरानी होती है यह देखकर कि हमारे समाज के शिखर पुरुष अभी तक समाज कल्याण, निचले तबकों का उत्थान तथा स्त्रियों के उद्धार के नारे बेचकर अपना काम चलाते रहे और अब देशभक्ति के जज़्बात भी बेचने लगे हैं। जब प्रचार माध्यम क्रिकेट में देशभक्ति की बात करते हैं तब उसे देख और सुनकर यही बात समझ में आती है। इस पर हंसी आती है। ऐसे में एक सवाल मन में आता है कि उनको क्या इस बात का आभास है कि लोग अब उनपर हंसते हैं क्योंकि उनका यह राजफाश हो चुका है वह केवल धन कमाने के लिये ही यह सब कर रहे है।

Thursday, March 31, 2011

Tie मैच की भविष्यवाणी या फिक्सिंग~~~~~ज़रा सोचिये~~~

बीसीसीआई और इंग्लैंड की टीम के बीच विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में खेले गये एक मैच की समाप्ति से पहले ही आस्ट्रेलिया के पूर्व स्पिनर शेन वार्न ने अपने ट्विटर पर भविष्यवाणी कर दी थी की मैच टाई होगा-यह जानकारी इंटरनेट की एक पत्रिका ने दी है। मैच के हारने जीतने की भविष्यवाणी तो कोई भी कर सकता है पर टाई, बराबर या अनिर्णीत होने की बात करने का दावा! वह भी सच निकले। वह भी ऐसे अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी की भविष्यवाणी जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आनॅलाईन सट्टा चलाता है। यह मामला चौंकाने वाला है।

क्रिकेट के पीछे फिक्सिंग का भूत हमेशा ही पड़ा रहता है। इस भूत को खड़ा भी वही लोग करते हैं जो स्वयं इससे पैसा कमाते हैं। शेन वॉर्न अगर क्रिकेट नहीं खेलता तो शायद उसे दुनियां में कोई नहीं जानता। विश्व क्रिकेट प्रतियोगता 2011 में बीसीसीआई और इंग्लैंड की टीम के मैच के टाई होने की भविष्यवाणी की और ऐसा हुआ भी। एक पत्रिका में ही हमने पढ़ा था कि वह बाकायदा क्रिकेट पर ऑन लाईन सट्टा चलाता है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या वह अपने ट्विटर पर सट्टा लगाने वालों को कोई संदेश दे रहा था या अपनी वेबसाईट पर ऐसा कोई खेल कर रहा था जिसे कोई भारत में समझ नहीं पा रहा।
वैसे सामने गोरी टीम थी तो लोग शायद इस पर यकीन न करें कि उन्होंने ट्ाई फिक्स की होगी। यहां के लोगों का गोरों पर अंधा विश्वास है, पर हमारा मानना है कि वह दिन गये जब गोरों की छवि ईमानदार की थी। अब तो हमें यह भी शक होता है कि पाकिस्तान के जिन तीन खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग में लंदन में धरा गया वह भी एक फिक्स मामला था। इसका उपयोग भारतीय उपमहाद्वीप में 2011 में हो रहे विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में यह संदेश देने के लिये किया गया कि अब सारे मैच साफ सुथरे होंगे। इसके अलावा पकड़े गये एक खिलाड़ी की पोल उसकी पूर्व प्रेमिका से खुलवाई गयी। वह पाकिस्तान की एक अभिनेत्री है जिसे बाद में भारत के एक टीवी चैनल के बिग बॉस कार्यक्रम के लिये चुना गया। क्रिकेट वालों से पंगा लेकर भी वह भारतीय टीवी चैनल के कार्यक्रम में आयी, उसी समय शक हो गया था कि कहीं कुछ गड़बड़ है। देखा जाये तो क्रिकेट और मनोरंजन के खैरख्वाह एक ही हैं ऐसे में यह कैसे संभव है कि एक क्षेत्र को बदनाम करने वाला दूसरे में पांव जमा ले। अब वही अभिनेत्री फिर बिग टॉस कार्यक्रम करने यहां आयी है। उसकी छवि बनी इसलिये थी कि उसने एक अपराध क्रिकेट खिलाड़ी की पोल खोली थी।
मामला फिक्स न लगे इसलिये गोरी पुलिस को बीच में लाया गया। उसने तीन पाकिस्तानी खिलाड़ी पकड़े या उससे पकड़वाये गये यह कहना कठिन है पर इतना तय हो गया कि क्रिकेट में अभी फिक्सिंग यथावत है। अब यह शेन वार्न की भविष्यवाणी सामने आयी है। कुछ लोग उसकी तुलना उस समुद्री जीव ऑक्टोपस बाबा से कर रहे हैं जिसके बारे में कहा गया कि उसने विश्व कप फुटबाल प्रतियोगिता में सही भविष्यवाणी की। एक बात याद रखने लायक है कि उस कथित बाबा की चर्चा भी अनेक मैचों के बाद प्रारंभ हुई थी। अब शेनवार्न भी बाबा के भेस में आ गये हैं। गोरे हैं तो विश्वसीय तो माने ही जायेंगे पर यहां अंग्रेज गोरे क्रिकेट खिलाड़ी शक शुबहे में आ गये हैं। अंपायर भी गोरे थे। हैरानी इस बात की है कि उन्होंने ऐसा क्या गुणा भाग बिठाया कि मैच टाई हो गया और उसके फिक्स होने का आभास तक नहीं हुआ। इन गोरे अंपायरों ने ब्रिटेन के एक खिलाड़ी को पगबाधा नहीं दिया तो एक खिलाड़ी के आउट होने की अपील भारतीय खिलाड़ियों ने नहंी की। हो सकता है कि भारतीय खिलाड़ियों को मतिभ्रम हुआ हो पर जब एक खिलाड़ी को पगबाधा आउट होने की अपील तीसरे अंपायर की तरफ बढ़ायी गयी तो उसने टीवी देखकर भी गलत निर्णय दिया जबकि यह दृश्य पूरी दुनियां को दिखाई दिया कि वह गोरा खिलाड़ी आउट था।
इसके बावजूद भी यह यकीन नहीं होता कि कभी मैच टाई फिक्स हो सकता है। अगर शेन वार्न की भविष्यवाणी को मैच के पहले ही फिक्स होने की बात सोचें तो मानना पड़ेगा कि क्रिकेट खेल में गजब के अभिनेता और निर्देशक आ गये हैं। इतना कि जो मानते हैं कि सारे मैच फिक्स होते हैं वह भी इस मैच को फिक्स नहीं मानेंगे। अब ऑक्टोपस के नये अवतार शेन वार्न पर सारी दुनियां की नज़रे रहेंगी। हर मैच के खत्म होने के एक घंटै पहले उनको ट्विटर पर ढूंढा जायेगा।  खासतौर से वह लोग जो क्रिकेट मैचों पर दाव लगाते हैं। ऐसे लोग इस देश में कम नहीं है, 
इस देश में क्रिकेट खेला नहीं जा रहा बेचा जा रहा है  !!